जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा केवल देवी आराधना, पारंपरिक रस्मों और विशाल रथ परिक्रमा का पर्व नहीं है, बल्कि यह बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, ऐतिहासिक विरासत और सामाजिक संवाद की अनूठी परंपराओं का भी प्रतीक है। इन्हीं परंपराओं में एक महत्वपूर्ण स्थान मुरिया दरबार का है, जिसे बस्तर की पारंपरिक जन-संसद के रूप में भी देखा जाता है। यहां कभी रियासतकाल में प्रजा को राजा के सामने अपनी समस्याएं और शिकायतें रखने का अवसर मिलता था। समय बदला, राजशाही समाप्त हुई और लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई, लेकिन मुरिया दरबार की परंपरा आज भी बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बनी हुई है।

करीब 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा में मुरिया दरबार का आयोजन सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। यह ऐसा मंच है, जहां बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले पारंपरिक समाज के प्रतिनिधि अपनी बात रखते हैं और स्थानीय समस्याओं, सामुदायिक जरूरतों तथा जनजातीय समाज से जुड़े मुद्दों को सामने लाते हैं। इस वर्ष 23 अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित मौजूदगी ने इस ऐतिहासिक आयोजन को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष चर्चा का विषय बना दिया है।
जब राजा के सामने खुलती थी प्रजा की समस्याओं की पोटली
मुरिया दरबार की ऐतिहासिक पहचान बस्तर रियासत की उस परंपरा से जुड़ी है, जिसमें पारंपरिक समाज के प्रतिनिधियों को राजा के सामने अपनी समस्याएं रखने का अवसर मिलता था। उस दौर में राजा शासन व्यवस्था का प्रमुख होता था और दरबार जनसाधारण की शिकायतों तथा अपेक्षाओं को सुनने का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता था।

समय के साथ शासन प्रणाली में बदलाव आया, लेकिन इस परंपरा का सांस्कृतिक महत्व बना रहा। आज मुरिया दरबार पारंपरिक जनजातीय नेतृत्व, सामाजिक प्रतिनिधियों और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संवाद का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। हालांकि, वर्तमान समय में यहां रखी जाने वाली मांगों पर कार्रवाई संबंधित विभागों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के अनुसार होती है।
मांझी, चालकी, गायता और सिरहा की रहती है महत्वपूर्ण भूमिका
मुरिया दरबार में बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों से पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था से जुड़े प्रतिनिधियों की भागीदारी रहती है। इनमें मांझी, चालकी, मुखिया, सिरहा, गुनिया, पुजारी और गायता जैसे पारंपरिक पदों से जुड़े लोग शामिल होते हैं।
इन प्रतिनिधियों का अपने-अपने क्षेत्रों में सामाजिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक जीवन से गहरा संबंध होता है। वे स्थानीय समस्याओं, ग्रामीण आवश्यकताओं और समाज की अपेक्षाओं को सामने रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यही विशेषता मुरिया दरबार को सामान्य आयोजनों से अलग बनाती है। यहां केवल परंपराओं का निर्वहन नहीं होता, बल्कि बस्तर की सामाजिक संरचना और पारंपरिक नेतृत्व की भूमिका भी दिखाई देती है।
यही विशेषता मुरिया दरबार को सामान्य आयोजनों से अलग बनाती है। यहां केवल परंपराओं का निर्वहन नहीं होता, बल्कि बस्तर की सामाजिक संरचना और पारंपरिक नेतृत्व की भूमिका भी दिखाई देती है।
1876 के मुरिया विद्रोह से जुड़ी मानी जाती है ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मुरिया दरबार के इतिहास का उल्लेख 1876 के मुरिया विद्रोह की पृष्ठभूमि में भी किया जाता है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 8 मार्च 1876 को ब्रिटिश प्रशासन के अधिकारी मेक जॉर्ज की पहल पर बस्तर के मांझियों, चालकी और पारंपरिक मुखियाओं को एक मंच पर लाने की व्यवस्था की गई थी।
उस दौर में आदिवासी समाज के असंतोष, स्थानीय समस्याओं और प्रशासन के साथ संवाद की आवश्यकता महत्वपूर्ण विषय थे। इसी ऐतिहासिक संदर्भ में मुरिया दरबार की परंपरा को समझा जाता है।
आगे चलकर यह आयोजन बस्तर की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। राजपरिवार की ऐतिहासिक विरासत और बदलती प्रशासनिक व्यवस्था के बीच इस परंपरा ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखी।
जल, जंगल, जमीन और विकास से जुड़े मुद्दों का मंच
बस्तर के जनजातीय समाज का जीवन जल, जंगल, जमीन, पारंपरिक मान्यताओं और सामुदायिक व्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐसे में मुरिया दरबार का महत्व केवल ऐतिहासिक विरासत तक सीमित नहीं रहता।
यह मंच स्थानीय जरूरतों, ग्रामीण सुविधाओं, जनजातीय संस्कृति के संरक्षण, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी सुविधाओं और विकास से जुड़े विषयों को सामने लाने का अवसर भी बन सकता है।
पारंपरिक प्रतिनिधियों की भागीदारी यह दर्शाती है कि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के दौर में भी बस्तर के सामाजिक जीवन में पारंपरिक नेतृत्व की अपनी अहम भूमिका है। इस परंपरा की सार्थकता इस बात में भी निहित है कि समाज की आवाज सुनी जाए और सामने आने वाले मुद्दों पर उचित स्तर पर विचार किया जाए।
बस्तर दशहरा: जहां आस्था के साथ जीवित हैं सामाजिक परंपराएं
बस्तर दशहरा देश के विशिष्ट सांस्कृतिक आयोजनों में गिना जाता है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में देवी आराधना, पारंपरिक रस्में, रथ परिक्रमा और जनजातीय रीति-रिवाजों की विविध छवियां देखने को मिलती हैं।
इस पर्व की विशेषता यह है कि इसकी पहचान केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। मुरिया दरबार जैसी परंपराएं बस्तर की सामुदायिक व्यवस्था, सामाजिक संवाद और सांस्कृतिक विविधता को भी सामने लाती हैं।
मुरिया, माड़िया, भतरा और डोरला सहित विभिन्न जनजातीय समुदायों की परंपराएं बस्तर की सामूहिक सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध बनाती हैं। मुरिया दरबार इसी विविधता और ऐतिहासिक निरंतरता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की मौजूदगी से बढ़ेगा आयोजन का महत्व
23 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के बस्तर दौरे के दौरान मुरिया दरबार में उनकी प्रस्तावित सहभागिता को विशेष महत्व दिया जा रहा है। स्वयं आदिवासी समाज से आने वाली राष्ट्रपति की मौजूदगी बस्तर की जनजातीय विरासत, सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता देने का अवसर होगी।

जगदलपुर के सिरहासार भवन में आयोजित होने वाले मुरिया दरबार को लेकर इस बार विशेष उत्सुकता है। राष्ट्रपति की मौजूदगी के बीच पारंपरिक समाज के प्रतिनिधियों की भागीदारी और आयोजन का स्वरूप चर्चा के केंद्र में रहेगा।
इस ऐतिहासिक अवसर पर किन मुद्दों को औपचारिक रूप से सामने रखा जाएगा और उनके संबंध में क्या संवाद होगा, यह आयोजन के दौरान स्पष्ट होगा।
मुरिया दरबार की असली ताकत उसकी परंपरा में
मुरिया दरबार की पहचान केवल उसके ऐतिहासिक महत्व या आयोजन की भव्यता में नहीं, बल्कि उस परंपरा में है, जो समाज के प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का अवसर देती है। यह बस्तर के अतीत की याद दिलाने के साथ वर्तमान सामाजिक व्यवस्था और संवाद की जरूरत को भी रेखांकित करता है।
जहां कभी राजा के सामने प्रजा अपनी समस्याएं रखती थी, वहीं आज बदलती लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह परंपरा बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सहभागिता का प्रतीक बनी हुई है।
बस्तर दशहरा की यही विशेषता है—यहां इतिहास केवल किताबों में दर्ज नहीं, बल्कि परंपराओं, आस्था और जनजीवन के बीच आज भी जीवित दिखाई देता है।






