बस्तर दशहरा 2026: अनूठी परंपरा के साथ संपन्न हुई बाहर रैनी की रस्म, कुम्हड़ाकोट से वापस लाया गया विशाल विजय रथ

नवाखानी की परंपरा में दिखी सामाजिक समरसता, राजपरिवार और ग्रामीणों ने साथ बैठकर ग्रहण किया प्रसाद
जगदलपुर | BASTAR MATI NEWS

विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरा में सदियों पुरानी लोकपरंपरा, आपसी सौहार्द और सांस्कृतिक एकता का अनूठा संगम देखने को मिला। गुरुवार को बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण रस्म ‘बाहर रैनी’ परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुई। इस अवसर पर आठ चक्कों वाले विशाल विजय रथ को कुम्हड़ाकोट के जंगलों से ससम्मान वापस लाया गया। साथ ही नई फसल के स्वागत में पारंपरिक नवाखानी की रस्म भी निभाई गई।

परंपरा के अनुसार, ‘भीतर रैनी’ की रस्म के बाद माड़िया जनजाति के लोग विशाल विजय रथ को शहर से दूर लालबाग स्थित कुम्हड़ाकोट के जंगलों में ले जाकर छिपा देते हैं। रथ को प्रतीकात्मक रूप से ‘चुराने’ की यह परंपरा बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है। इसके माध्यम से राजा और प्रजा के बीच आत्मीय संबंध, संवाद और मान-मनौव्वल की परंपरा को जीवंत रखा जाता है।

कुम्हड़ाकोट में हुई मान-मनौव्वल

‘बाहर रैनी’ के अवसर पर बस्तर राजपरिवार के सदस्य चोरी हुए विजय रथ को वापस लाने के लिए कुम्हड़ाकोट पहुंचे। यहां उन्होंने माड़िया समाज के लोगों और ग्रामीणों के साथ बैठकर परंपरागत रूप से संवाद किया। राजपरिवार के सदस्यों ने ग्रामीणों के बीच पहुंचकर उन्हें मनाया और आपसी प्रेम, विश्वास तथा भाईचारे का संदेश दिया।

इस पारंपरिक मुलाकात ने बस्तर की उस अनूठी संस्कृति को फिर से सामने रखा, जिसमें लोकआस्था के साथ सामाजिक संबंधों और सामुदायिक सहभागिता को विशेष महत्व दिया जाता है।

नवाखानी में नई फसल का प्रसाद

मान-मनौव्वल के बाद कुम्हड़ाकोट में पारंपरिक नवाखानी का आयोजन किया गया। नई फसल के आगमन की खुशी में नए चावल से खीर तैयार कर नैवेद्य अर्पित किया गया। इसके बाद राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव, बस्तर के सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, महापौर संजय पांडे और ग्रामीणों ने एक साथ पंगत में बैठकर प्रसाद ग्रहण किया।

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यह दृश्य बस्तर की सामाजिक समरसता, परस्पर सम्मान और सांस्कृतिक एकजुटता का प्रतीक बना।

शाही ठाठ-बाट के साथ लौटा विजय रथ

नवाखानी और पारंपरिक रस्मों के संपन्न होने के बाद माड़िया समुदाय के लोगों तथा राजपरिवार के सदस्यों ने मिलकर आठ चक्कों वाले विशाल विजय रथ को वापस लाने की प्रक्रिया पूरी की। पारंपरिक गाजे-बाजे और जयकारों के बीच रथ को राजमहल के सिंह द्वार तक लाया गया।

इस तरह ‘बाहर रैनी’ की रस्म ने एक बार फिर बस्तर दशहरे की विशिष्ट परंपराओं और जनजातीय संस्कृति की समृद्ध विरासत को जीवंत कर दिया। बस्तर दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि यहां के समाज, लोकजीवन, परंपराओं और आपसी सद्भाव का प्रतीक भी है।

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