जगदलपुर। बस्तर के ऐतिहासिक एवं विश्वविख्यात गोंचा महापर्व के अंतर्गत आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर सोमवार को हेरा पंचमी का पारंपरिक पूजा-विधान श्रद्धा, भक्ति और वैदिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर श्रीश्री महालक्ष्मी जी की दो भव्य डोलियां नगर भ्रमण एवं रथ परिक्रमा मार्ग से होते हुए गुड़िचा मंदिर (सिरहासार भवन) पहुँचीं, जहाँ भगवान श्री जगन्नाथ के साथ पारंपरिक लक्ष्मी-नारायण संवाद का आयोजन किया गया। धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद दोनों डोलियां पुनः श्री जगन्नाथ मंदिर लौट आईं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्री जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और माता सुभद्रा रथयात्रा के दौरान गुड़िचा मंदिर, जिसे मौसी घर भी कहा जाता है, में चार दिनों तक विराजमान रहते हैं। इस दौरान भगवान के श्री मंदिर वापस नहीं लौटने पर माता महालक्ष्मी उनकी खोज में निकलती हैं। गुड़िचा मंदिर पहुँचने पर भगवान श्री जगन्नाथ और माता महालक्ष्मी के बीच होने वाले पारंपरिक संवाद को लक्ष्मी-नारायण संवाद कहा जाता है, जिसे हेरा पंचमी के रूप में मनाया जाता है।

बस्तर की सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार श्री जगन्नाथ मंदिर से महालक्ष्मी जी की दो डोलियां निकाली जाती हैं। पहली डोली राजपरिवार, राजगुरु एवं कुँवर परिवार के निवास पर दर्शन एवं पूजन के बाद मंदिर के मुख्य द्वार पहुँचती है। इसके पश्चात दूसरी डोली मंदिर से प्रस्थान करती है। दोनों डोलियां एक साथ रथ परिक्रमा मार्ग से होते हुए गुड़िचा मंदिर पहुँचती हैं, जहाँ विधि-विधान के साथ लक्ष्मी-नारायण संवाद की परंपरा निभाई जाती है।
हेरा पंचमी का यह आयोजन भगवान श्री जगन्नाथ और माता महालक्ष्मी के अटूट स्नेह, समर्पण और दांपत्य भाव का प्रतीक माना जाता है। बस्तर में यह अनूठी धार्मिक परंपरा पिछले 619 वर्षों से अखंड आस्था, श्रद्धा और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ निभाई जा रही है, जो बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासत को आज भी जीवंत बनाए हुए है
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