पांचवीं बार काछन देवी का स्वरूप धारण करेंगी 10 वर्षीय पीहू दास, सदियों पुरानी परंपरा में आज भी कायम है जनजातीय आस्था का अनूठा विश्वास
जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की सदियों पुरानी परंपराओं में शामिल काछनगादी रस्म का निर्वहन 10 अक्टूबर को किया जाएगा। इस वर्ष 10 वर्षीय पीहू दास काछन देवी का स्वरूप धारण कर इस ऐतिहासिक अनुष्ठान को पूरा करेंगी। पनका समाज की पीहू लगातार पांचवीं बार इस रस्म में शामिल होंगी। बेल के नुकीले कांटों से बने विशेष झूले पर विराजमान होकर वह बस्तर राजपरिवार को दशहरा पर्व की प्रमुख रस्मों को आगे बढ़ाने की अनुमति देंगी। मान्यता है कि काछन देवी की अनुमति और आशीर्वाद के बाद ही दशहरा पर्व की आगामी रस्में विधिवत आगे बढ़ती हैं। इस दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य देवी स्वरूप कन्या के समक्ष फूल और नारियल अर्पित कर पर्व के निर्विघ्न संपन्न होने की कामना करते हैं।”

आड़काछेपड़ा गांव की रहने वाली हैं पीहू*पीहू दास मूल रूप से कोंडागांव जिले के आड़काछेपड़ा गांव की रहने वाली हैं। वह पनका समाज से ताल्लुक रखती हैं। कम उम्र में ही उन्हें बस्तर की इस विशिष्ट धार्मिक परंपरा से जुड़ने का अवसर मिला। वर्ष 2026 में वह लगातार पांचवीं बार काछन देवी का स्वरूप धारण करेंगी। इस परंपरा में उनकी भूमिका केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही लोक-आस्था का भी प्रतीक है।
काछनगादी रस्म के दौरान विशेष रूप से तैयार किए गए बेल के नुकीले कांटों वाले झूले पर कन्या को विराजमान कराया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दौरान कन्या में काछन देवी का स्वरूप देखा जाता है।
राजपरिवार देवी के समक्ष उपस्थित होकर दशहरा आयोजन के लिए अनुमति मांगता है।
इस रस्म को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है। यह परंपरा बस्तर की उन विशिष्ट सांस्कृतिक मान्यताओं को दर्शाती है, जिनमें जनजातीय समाज की धार्मिक परंपराओं को विशेष स्थान प्राप्त है।देश के अन्य हिस्सों में दशहरा जहां रावण दहन के लिए प्रसिद्ध है, वहीं बस्तर दशहरा माता दंतेश्वरी की आराधना और जनजातीय परंपराओं के कारण अपनी अलग पहचान रखता है।
लगभग 75 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में विभिन्न समुदायों की भागीदारी और पारंपरिक रस्में बस्तर की सांस्कृतिक विविधता को सामने लाती हैं। पनका समाज की मान्यताओं से जुड़ी इस रस्म में एक बालिका को देवी स्वरूप में पूजकर राजपरिवार द्वारा पर्व की अनुमति लेना सामाजिक समरसता, लोकविश्वास और सांस्कृतिक निरंतरता का संदेश देता है।
पीहू दास के माध्यम से एक बार फिर बस्तर की यह ऐतिहासिक परंपरा जीवंत होगी।






