3 सितंबर को होगी माता शीतला की पूजा-अर्चना, घरों में नहीं जलेगा चूल्हा
जगदलपुर। सिंधी समाज का प्रमुख लोकपर्व थदड़ी इस वर्ष 3 सितंबर को श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। रक्षाबंधन के आठवें दिन मनाए जाने वाले इस पर्व का सिंधी समाज में विशेष धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। सिंधी भाषा में ‘थदड़ी’ का अर्थ ठंडी या शीतल होता है। पर्व को लेकर जगदलपुर के सिंधी समाज में उत्साह है और घर-घर तैयारियां शुरू हो गई हैं।

मोहनजोदड़ो काल से जुड़ी है मान्यता
श्री पूज्य सिंधी पंचायत के अध्यक्ष मनीष मूलचंदानी ने बताया कि मान्यता है कि हजारों वर्ष पूर्व मोहनजोदड़ो की खुदाई के दौरान माता शीतला देवी की प्रतिमा प्राप्त हुई थी। इसी आस्था और परंपरा से जुड़ा थदड़ी पर्व सिंधी समाज द्वारा वर्षों से श्रद्धापूर्वक मनाया जाता रहा है।
पर्व के एक दिन पूर्व 2 सितंबर को सिंधी परिवारों में विभिन्न पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाएंगे। इनमें कूपड़, गच, कोकी, सूखी तली हुई सब्जियां—भिंडी, करेला और आलू, रायता, दही-बड़े तथा मक्खन प्रमुख हैं। रात में सोने से पहले चूल्हे पर जल छिड़ककर पूजा की जाती है और इसके बाद चूल्हे को ठंडा कर दिया जाता है।
घरों में नहीं जलेगा चूल्हा, ठंडे भोजन का लगेगा भोग
सुहिणी सोच महिला विंग की अध्यक्षा लक्ष्मी नवतानी ने बताया कि 3 सितंबर को थदड़ी पर्व के दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाएगा। परिवार के सभी सदस्य एक दिन पूर्व तैयार किए गए ठंडे भोजन का ही सेवन करेंगे।
बदलते समय के साथ अब कई परिवार घर में ही जल स्रोत के पास माता शीतला की विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं। पूजा में बच्चों को विशेष रूप से शामिल किया जाता है तथा उनके उत्तम स्वास्थ्य और शीतलता की कामना की जाती है।
इस अवसर पर पारंपरिक प्रार्थना की जाती है—
“ठार माता ठार, पहिंजे बच्चणन खे ठार, माता अगे भी ठारियो, तई हाणे भी ठार।”
भाईचारे और सुख-समृद्धि का संदेशसुहिणी सोच की सचिव भारती लालवानी ने कहा कि थदड़ी पर्व केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि समाज की एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक परंपराओं को मजबूत करने का अवसर भी है। इस दिन थदड़ी माता (शीतला माता) से परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और निरोगी काया की प्रार्थना की जाएगी।
पूजा-अर्चना के बाद समाज के लोग एक-दूसरे के घर जाकर पर्व की शुभकामनाएं देंगे और पारंपरिक प्रसाद एवं व्यंजनों को साझा करेंगे। इस तरह थदड़ी पर्व नई पीढ़ी को भी सिंधी समाज की समृद्ध संस्कृति, लोक आस्था और पारंपरिक विरासत से जोड़ने का संदेश देगा।






