जगदलपुर। बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की पावन धरती पर विश्व प्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक 75 दिवसीय बस्तर दशहरा महापर्व का शुभारंभ होने जा रहा है। 12 अगस्त को हरेली अमावस्या के शुभ अवसर पर मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में पाट जात्रा पूजा विधान के साथ दशहरा पर्व की विधिवत शुरुआत होगी।

पाट जात्रा पूजा के दौरान दशहरा पर्व के लिए रथ निर्माण में उपयोग होने वाले औजार तैयार करने की ठुरलु खोटला रस्म निभाई जाएगी। इस पारंपरिक रस्म में मांझी-चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन, पुजारी, पटेल और सेवदार सहित विभिन्न पारंपरिक पदाधिकारी अपनी सहभागिता निभाएंगे। बस्तर दशहरा समिति ने इस ऐतिहासिक अवसर पर ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों एवं गणमान्य नागरिकों से बड़ी संख्या में उपस्थित होकर इस अनूठी परंपरा के साक्षी बनने का आह्वान किया है।
सितंबर से अक्टूबर तक चलेगा आस्था और परंपरा का अनूठा सफर
75 दिवसीय बस्तर दशहरा महापर्व के अंतर्गत आगामी 24 सितंबर को डेरी गड़ाई पूजा विधान संपन्न होगा। इसके बाद अक्टूबर माह में पर्व अपनी पूर्ण भव्यता की ओर बढ़ेगा। 10 अक्टूबर को काछनगादी, 11 अक्टूबर को कलश स्थापना और 12 अक्टूबर को जोगी बिठाई की रस्म निभाई जाएगी।
13 से 18 अक्टूबर तक श्रद्धालु प्रतिदिन नवरात्रि पूजा और भव्य रथ परिक्रमा के साक्षी बनेंगे। इसके बाद 18 अक्टूबर को बेल पूजा, 19 अक्टूबर को महाअष्टमी एवं निशा जात्रा तथा 20 अक्टूबर को मावली परघाव का आयोजन होगा।
रथ परिक्रमा से मुरिया दरबार तक दिखेगी बस्तर की अनूठी परंपरा
पर्व के दौरान 21 और 22 अक्टूबर को भीतर रैनी एवं बाहर रैनी की ऐतिहासिक रथ परिक्रमा होगी। 23 अक्टूबर की सुबह काछन जात्रा के बाद ऐतिहासिक मुरिया दरबार का आयोजन किया जाएगा, जिसमें जनप्रतिनिधि एवं ग्रामीण अपनी समस्याओं और क्षेत्रीय विषयों पर चर्चा करेंगे।
इसके पश्चात 24 अक्टूबर को कुटुम्ब जात्रा में ग्राम्य देवी-देवताओं को विदाई दी जाएगी। वहीं 27 अक्टूबर को मावली माता की डोली की भावुक विदाई के साथ 75 दिवसीय बस्तर दशहरा महापर्व का भव्य समापन होगा।
600 साल पुरानी परंपरा, रावण दहन नहीं—देवी-देवताओं के मिलन का पर्व है बस्तर दशहरा
छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा दुनिया के सबसे लंबे समय तक चलने वाले पर्वों में से एक है, जो लगभग 75 दिनों तक विभिन्न धार्मिक एवं पारंपरिक रस्मों के साथ मनाया जाता है। इसकी परंपरा करीब 600 वर्ष पुरानी मानी जाती है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार 15वीं शताब्दी में, सन् 1408 के बाद काकतीय/चालुक्य वंश के शासक राजा पुरुषोत्तम देव ने बस्तर दशहरा की रथ परंपरा को स्वरूप दिया।
जगन्नाथ पुरी से जुड़ी है रथ परंपरा
मान्यता के अनुसार राजा पुरुषोत्तम देव जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर गए थे। वहां उन्हें ‘रथपति’ की उपाधि प्राप्त हुई। पुरी से लौटने के बाद उन्होंने रथयात्रा की परंपरा को बस्तर की स्थानीय लोक-संस्कृति और देवी-देवताओं की आराधना से जोड़ते हुए इस अनूठे पर्व की नींव रखी।
धीरे-धीरे यह पर्व बस्तर के अलग-अलग गांवों और विभिन्न जनजातीय समुदायों को एक सूत्र में जोड़ने वाली सांस्कृतिक परंपरा बन गया।
यहां नहीं होता रावण दहन
बस्तर दशहरा देश के अन्य दशहरा आयोजनों से पूरी तरह अलग है। यहां रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। यह पर्व भगवान राम और रावण के युद्ध या रावण वध पर आधारित न होकर मां दंतेश्वरी सहित बस्तर अंचल के देवी-देवताओं के मिलन और आराधना का पर्व है।
पाट जात्रा से शुरू होती है रथ निर्माण की परंपरा
बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्मों में पाट जात्रा का विशेष महत्व है। हरेली अमावस्या के अवसर पर जंगल से लकड़ी लाकर रथ निर्माण की प्रक्रिया की शुरुआत की जाती है। इसके बाद विभिन्न पारंपरिक रस्मों के माध्यम से पर्व आगे बढ़ता है।
मावली परघाव और विशाल रथ बनते हैं आकर्षण
बस्तर दशहरा की सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में मावली परघाव शामिल है, जब मां दंतेश्वरी की डोली और छत्र को दंतेवाड़ा से जगदलपुर लाया जाता है। वहीं पर्व के दौरान विशाल लकड़ी का रथ तैयार किया जाता है, जिसे परंपरागत रूप से ग्रामीण और विभिन्न समुदायों के लोग मिलकर खींचते हैं।
मुरिया दरबार में होता है परंपरा का महत्वपूर्ण पड़ाव
बस्तर दशहरा के दौरान आयोजित मुरिया दरबार भी अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यह पारंपरिक मंच है, जहां स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों के बीच विभिन्न सामाजिक एवं जनसमस्याओं पर संवाद और चर्चा की परंपरा रही है।
बस्तर दशहरा इसलिए सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि बस्तर की आदिवासी संस्कृति, लोक आस्था, सामाजिक एकता और सदियों पुरानी परंपराओं का जीवंत दस्तावेज है। इसकी प्रत्येक रस्म बस्तर की विशिष्ट पहचान और यहां के जनजीवन से गहराई से जुड़ी हुई है।






