दंतेवाड़ा से पहुंचीं मां मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र की हुई भव्य अगवानी, कमलचंद भंजदेव सहित जनप्रतिनिधियों और हजारों श्रद्धालुओं ने निभाई परंपरा — जयकारों से गूंज उठा जिया डेरा से राजमहल तक का परिसर।
जगदलपुर। विश्वप्रसिद्ध 75 दिवसीय बस्तर दशहरा की सबसे भावुक, विशिष्ट और आस्था से जुड़ी परंपराओं में शामिल मावली परघाव की रस्म मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुई। इस ऐतिहासिक अवसर पर बस्तर संभाग के 194 गांवों के देवी-देवताओं की मौजूदगी ने आयोजन को विशेष बना दिया। दंतेवाड़ा से माता मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र के आगमन के साथ ही जगदलपुर का वातावरण भक्तिमय हो उठा। हजारों श्रद्धालु इस अलौकिक परंपरा के साक्षी बने।

जिया डेरा से आगे बढ़ती माई जी की डोली के स्वागत के लिए सड़क के दोनों ओर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज, देवी-देवताओं के जयकारों और पारंपरिक विधि-विधानों के बीच माता की अगवानी की गई। यह दृश्य केवल एक धार्मिक आयोजन का नहीं, बल्कि बस्तर की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत, जनजातीय परंपराओं और सामूहिक आस्था के जीवंत स्वरूप का प्रतीक बना।

दो बहनों के मिलन की परंपरा, भावुक कर देता है माई जी की डोली का आगमन
मावली परघाव की सबसे खास बात इससे जुड़ी धार्मिक मान्यता है। बस्तर की लोकपरंपरा में दंतेवाड़ा की आराध्य माता मावली को मां दंतेश्वरी की बड़ी बहन माना जाता है। इसी मान्यता के चलते माता मावली की डोली का जगदलपुर आगमन दो बहनों के पावन मिलन के रूप में देखा जाता है।
जब दंतेवाड़ा से माता मावली की डोली जगदलपुर पहुंचती है, तो उनका स्वागत मां दंतेश्वरी की नगरी में पूरे सम्मान और श्रद्धाभाव के साथ किया जाता है। यही वजह है कि मावली परघाव बस्तर दशहरा की उन रस्मों में शामिल है, जिनसे लोगों की भावनाएं गहराई से जुड़ी हुई हैं।
स्थानीय परंपरा में ‘परघाव’ का अर्थ आदर-सत्कार के साथ स्वागत और अगवानी करना है। यह आयोजन देवी-भक्ति के साथ बस्तर की आत्मीयता, सामाजिक एकता और परंपराओं के प्रति समर्पण को भी प्रदर्शित करता है।
राजपरिवार से जनप्रतिनिधियों तक, सभी ने की माता की अगवानी
इस ऐतिहासिक रस्म में बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ माता की अगवानी की। आयोजन में माझी-चालकी, पारंपरिक सेवादारों, ग्रामीणों और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की सहभागिता रही।

मावली परघाव में प्रदेश के वन मंत्री केदार कश्यप, बस्तर सांसद महेश कश्यप, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं जगदलपुर विधायक किरण देव और महापौर संजय पांडे सहित जनप्रतिनिधि भी शामिल हुए।
राजपरिवार और स्थानीय समाज की सहभागिता इस बात का प्रमाण है कि राजशाही का दौर समाप्त होने के बाद भी बस्तर की परंपराएं और देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा आज भी उसी आत्मीयता से निभाई जा रही हैं।
चंदन, नए वस्त्र और फूलों से सजती है माता की डोली
मावली परघाव की परंपरा अपने विशिष्ट धार्मिक विधान के लिए भी जानी जाती है। प्रचलित परंपरा के अनुसार, दंतेवाड़ा में नए वस्त्र पर चंदन का लेप लगाकर माता मावली का प्रतीकात्मक स्वरूप तैयार किया जाता है। इसे फूलों से सजाकर डोली में विराजित किया जाता है और फिर जगदलपुर लाया जाता है।

माता की डोली के साथ जुड़ी प्रत्येक परंपरा में श्रद्धा, सम्मान और सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई देती है। दंतेवाड़ा से जगदलपुर तक माता का आगमन केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों को आस्था के सूत्र में जोड़ने वाला आयोजन है।
छह सौ वर्षों की विरासत, आज भी कायम है परंपरा का गौरव
बस्तर दशहरा की परंपरा लगभग छह शताब्दियों से अधिक पुरानी मानी जाती है। इस ऐतिहासिक पर्व की विशिष्टता यह है कि यहां उत्सव का केंद्र रावण दहन नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी और क्षेत्रीय देवी-देवताओं की आराधना तथा उनसे जुड़ी पारंपरिक रस्में हैं।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इन परंपराओं में आदिवासी समाज, राजपरिवार और स्थानीय समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मावली परघाव इसी विरासत का ऐसा अध्याय है, जिसमें बस्तर का इतिहास, धार्मिक आस्था और जनजातीय संस्कृति एक साथ दिखाई देते हैं।
नई फसल और नवाखानी परंपरा से भी जुड़ा है मावली परघाव
माता मावली की डोली के साथ नए अन्न की परंपरा भी जुड़ी हुई है। प्रचलित विवरणों के अनुसार, माता के साथ लाए जाने वाले नए अन्न का संबंध बस्तर राजपरिवार की नवाखानी परंपरा से माना जाता है।
यह मान्यता मावली परघाव को खेती-किसानी, नई फसल और बस्तर के पारंपरिक जीवन से भी जोड़ती है। इस प्रकार यह रस्म केवल पूजा और स्वागत तक सीमित नहीं रहती, बल्कि बस्तर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की झलक भी प्रस्तुत करती है।
मां दंतेश्वरी मंदिर में होंगे दर्शन, फिर दंतेवाड़ा लौटेंगी माता
मावली परघाव के बाद माता मावली की डोली और मां दंतेश्वरी का छत्र जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर में स्थापित किए गए हैं। उपलब्ध कार्यक्रम संबंधी जानकारी के अनुसार, श्रद्धालु 26 अक्टूबर तक दर्शन कर सकेंगे। इसके बाद 27 अक्टूबर को माता की विदाई और डोली के दंतेवाड़ा लौटने का कार्यक्रम निर्धारित है।
मावली परघाव में दिखती है पूरे बस्तर की सांस्कृतिक पहचान
194 गांवों के देवी-देवताओं की मौजूदगी, राजपरिवार की पारंपरिक भूमिका, जनप्रतिनिधियों की सहभागिता और हजारों श्रद्धालुओं की आस्था ने मावली परघाव को बस्तर दशहरा 2026 का एक यादगार अवसर बना दिया।
यह परंपरा संदेश देती है कि बस्तर की असली पहचान केवल उसके ऐतिहासिक उत्सवों में नहीं, बल्कि उन मान्यताओं, रीति-रिवाजों और सामुदायिक संबंधों में भी बसती है, जिन्हें यहां के लोग सदियों से सहेजते आ रहे हैं
माई जी की डोली का आगमन, दो बहनों के मिलन की मान्यता और 194 गांवों के देवी-देवताओं की उपस्थिति — मावली परघाव बस्तर की उस अनूठी विरासत का प्रतीक है, जहां आस्था ही परंपरा है और परंपरा ही बस्तर की पहचान।
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आशीष श्रीवास्तव
Founder & Editor-in-Chief
BMN – BASTAR MATI NEWS






